छूटे न छूटे यह आदत महकशी की
छूटे न छूटे यह आदत महकशी की . भूले न भूले वोह यादें मेरे महबूब की .
बहुत कमज़ोर हैं मेरे इरादे, बहुत फराबी हैं तेरे वादे
वक़्त बहुत कम और तमनाये हज़ार
किस किस को छोडू और किस किस को पूरा करूँ
आते जाते रहतें हाँ सबूत मेरे वजूद के (like I want a proof that I m dead or living ) छूटे न छूटे ....
हज़ार बार भुलाने की कोशिश की मैंने, हज़ार बार इस महकशी से तौबा की मैंने
फिर भी उभर उभर के आतें है अरमान ज़िन्दगी के .
समझ में कुछ नहीं आता और बड़ा परेशान है राजीव, के किस किस को बताऊँ
और किस किस से छुपौं , यह गुनाह मेरी ज़िन्दगी के
छूटे न छूटे ...
तेरी बज़्म में हर रात शम्मा की तरहं जला मै, मगर तुझको खबर कहाँ !
मेरा दिल जला जला के, सकती रही तू इन अँधेरी सरद रातों का मज़ा
जाने खबर तुमको कब होगी, मेरे जिस्म के राख होने की छूटे न छूटे ....
वाह मेरे मौला, दिल दिया तुने मगर धरकन न दी . सब कुछ दिया तुमने मगर उल्फत न दी
तेरी आदत ही कुछ एसी है के कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं देता .
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