अब तो आदत सी पड़ गई है
अब तो आदत सी पड़ गई है महकशी की, इलज़ाम किस के सर दूं ?
रोज़ ढून्ढता हूँ नए नए बहाने पीने के, दामन किस बहाने का आज लूं ?
कुछ कमी सी है ज़िन्दगी में मेरी
समझ में नहीं आता , के यह सूनापन ख़तम कैसे करूँ ?
ख़ुदकुशी है यह , या कतल है मेरा ? कुछ समझ में नहीं आता
खुद ही कातिल , खुद ही मुनसिब , सजा दूँ तो किस को दूं ?
अब तो आदत सी पड़ गई है ..
हकीकत तो यह है की बड़ा कमज़ोर है यह राजीव .
अपनी कमजोरी की वजह ज़माने को दूं या न दूं ?
अब तो आदत सी ...
Comments
Post a Comment